जब कोई हमारा संत या प्रचारक मानवता सांझीवालता की बात करता है तब मुझे ऐसा महसूस होने लगता है जैसे वो गिड़गिड़ा कर उन लोगों से कह रहा हो जिन्होनें हज़ारों सालों से हमारा शोषण और नफरत फैलाई, "मुझे अपने साथ ले लो।"
दूसरे नज़रिए से भी अगर देखें दलित-आदिवासी के बीच में ये विचार रख कर क्या हमारे संत या प्रचारक क्या कोई नया सिद्धांत या समाधान दे रहे हैं। मेरे ख्याल से तो बिलकुल नहीं। सब एक रूप के नाम पर तो हमारी जातियें पहले ही पद-भ्रष्ट हैं। हर जगह नाक रगड़ने लगी हुई हैं। फिर नया क्या ? मानवता का सन्देश हमारे संत-महापुरुष पिछले 600 साल से दे रहे हैं। उसके बावजूद उन्हें उस वक्त चीख-चीख कर अपनी जाति बतानी पड़ी। देखो उनके श्लोकों में। क्यों उन्हें जाति के सवाल पर अपना पक्ष रखते हुए अपनी जातीय पहचान बतानी पड़ी। आज के संत प्रचारकों में इतनी हिम्मत भी नहीं।
सोचना और विचारणीय यह है कि रोज़ शोषण झेल कर और यह पता है कि उनके मानवता-मानवता रटने कोई दूसरा उनको पूजनीय मानने वाला नहीं। रहेंगे वो हमारे बीच ही। रोटी भी हमारी ही खाएंगे और कपडा भी हमारा ही पहनेंगे यही नहीं धर्म-स्थल भी जातीय पहचान से बनाएंगे, फिर क्यों ?
यह सत्य है कि ईश्वर ने इंसान को बराबर बनाया। बराबर के हाथ-पैर दिए। रंग-रूप या नैन-नक्श कुछ अलग हैं वो केवल भू-गोलीय भिन्नता के कारण और कुछ भी अलग नहीं। एक सत्य यह भी है कि ईश्वर के इंसान ने भेद-भाव बनाया। गोरों ने भारत में सारे क्लब के बहार लिखा था, "कुत्ते और भारतीय अन्दर नहीं आ सकते।"
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